Saturday, May 8, 2010

लव सेक्स और धोखा+सिंगल स्क्रीन सिनेमाहॉल

...खस्ताहाल, गंदले और बदबूदार सिनेमाहाल मे एक ऐसी फिल्म, जिसका इंतज़ार तब से था, जब पहली बार नेट पर उसका खूबसूरत पोस्टर देखा था। हाल के पार्किंग लाट पर अपनी बाइक खड़ी करता हूँ, ढेर साड़ी गाड़ियाँ खड़ी हुई हैं, सोचता हूँ - वाह, फिल्म चल जाएगी शायद क्योंकि लास्ट शो मे इतने लोग कम ही दिखते हैं (भले ही पहला दिन हो) वो भी तब जब फिल्म मे कोई फन्ने खां स्टार ना हो...
...इस चुप्पे शहर मे कोई पीवीआर, आईमैक्स या फन सिनेमा नहीं है, बस ज्योति, सरगम, रंगमहल जैसे ईस्ट मैन कलर पीरियड वाले नामो के सफ़ेद परदे हैं, उन्ही मे से एक संगम भी है। 
...तो ६० रुपये का सबसे महँगा- हा...हा...हा...- 'बालकनी गोल्ड' टिकट लेता हूँ और अन्दर जाता हूँ वहां पतली मूछों और मोटे चेहरे वाला एक बंदा (जिसके हाथ मे एक स्टील की टार्च है) मेरे पीले रंग का टिकट लेकर इत्मीनान से आधा फाड़ता है, मेरी हड़बड़ी देखता है और टोंट  मारने वाले लहजे मे एक ग्रेट इन्फार्मेशन देता है, "अबी सुरु नीं हुई हे, पन्दरा मिनट हें " मैं बाकी का बचा खुचा टिकट वापस लेता हूँ, अन्दर घुसता हूँ...
...सिंगल स्क्रीन सिनेमाहाल का टिकट भी साला, सबसे परफेक्ट रिप्रेजेंटेटिव होता है वहां का दुनिया का सबसे पतला कागज़, पीला, गुलाबी या फिर नीले रंग का
...हाल के अन्दर- सीढ़ियों के नीचे, खम्भों के ऊपर और चारो कोनो मे- फिल्म का कामसूत्र नुमा पोस्टर लगा हुआ है उफ़... कितना खूबसूरत है जब भी देखता हूँ इसे, लगता है पहली बार देख रहा हूँ, ब्रिलियंट। अब क्रेडिट टाइटल पढ़ रहा हूँ झटका! प्रोड्यूसर्स मे एकता कपूर का नाम नहीं है ऐसा कैसे? यानि मेरी इन्फार्मेशन गलत थी तो फिर पैशन फार सिनेमा मे एकता और दिबाकर बैनर्जी का जो कंवर्जेशन पढ़ा था, वो साला क्या था??? सोचा, चलो कल चेक करूँगा...
...सब कुछ जान लेने की हवस के चलते दुनिया भर की चीज़ें पढ़ लेना और फिर खुद को बुद्ध का अवतार मान कर कोई रेफरेंस चेक करना, लेकिन अगर वो गलती से भी गलत निकले तो ऐसा झटका लगना जैसे अमेरिका ने मेरे अपने सर पे न्यूक्लियर बम गिराने की धमकी पर्सनली दी हो- मेरे साथ ऐसा ही होता है.
...तो वापस मुड़ता हूँ, सीढियां चढ़ता हूँ, और हॉल के अन्दर पहुंचकर टॉर्च वाले को- जो गेट पर खड़े टॉर्च वाले का जुड़वाँ लगता है- अपना टिकट दिखाता हूँ. वो बंद सबसे ऊपर वाली लाइन की सीट पर टॉर्च लाइट डाल कर कहता है- बो जो पीली सर्ट बाले भैया हें ना, उनके जस्ट आगे बाली. - जाकर अपनी सीट पर बैठता हूँ. सीट के  हत्थों  के अगले सिरे पर बने गड्ढों मे कोल्ड ड्रिंक की खाली  बोतलें घुसी हुई हैं.- घटिया सिनेमा हॉल मे आपका स्वागत है. - थोड़ी खीझ महसूस करता हूँ और फिर उन बोतलों को बगल की खाली  सीटों के गड्ढों मे पटकता हूँ. अब खाली सफ़ेद परदे की तरफ घूरना शुरू कर देता हूँ...
...सिनेमा हॉल कितना भी बुरा हो, फिल्म  मन की हो तो सब माफ़. और अगर फिल्म का नाम लव, सेक्स और धोखा जैसा कुछ हो तब तो सौ खून भी माफ़. 
... तो फिल्म शुरू होने मे अभी थोडा टाइम है, मोबाइल निकालकर मैसेज टाइप करता हूँ- लव, सेक्स और धोखा डार्लिंग लव, सेक्स और धोखा- और दो-तीन दोस्तों को भेज देता हूँ. उनके रिप्लाई आना भी शुरू हो जाते हैं- फिल्म देख रहे हो क्या?? डार्लिंग डार्लिंग डार्लिंग.  वाह-वाह .- पीछे की सीटों पर चार-पांच इंजीनियरिंग स्टुडेंट्स बैठे हैं.- ये स्टुडेंट्स की वो कौम है जो एक नज़र मे ही पहचान मे आ जाती है.- इन्ही मे वो पीली शर्ट वाले भैया भी हैं. हंसी-ठट्ठा चल रहा है. एक बोलता है, यार डॉली को भी ले के आना चाहिए...ठहाका! दूसरा बोलता है, हाँ बे बड़ा झाटू हॉल है साला एक भी माल नहीं है...एक और ठहाका! तीसरा एक्साईटमेंट मे उतराते हुए बोलता है, अबे आज तो गाली-वाली देते हुए देखेंगे पिक्चर...फिर ठहाका.  
...जब आस-पास कोई लड़की ना हो, और सिर्फ ढेर सारे लड़के हों - वो भी सिनेमाहाल मे - तो माहौल कुछ ज्यादा ही मर्दाना हो जाता है. हर कोई एक्सट्रीम हरकतें करने लगता है. फिर चाहे ठहाके लगाना हो, गालियाँ देना हो, या तरह-तरह के इशारे करना. 
...तो किसी फिल्मी विधवा जैसे दिख रहे खाली सफ़ेद परदे पर अचानक रंग दिखने लगते हैं, लगता है जैसे फिल्म शुरू हो गई. लेकिन विजुअल ऐसा है जैसे विको वज्रदंती टाइप के किसी प्रोडक्ट का ऐड हो. लेकिन फिर अगले ही पल लगता है कि अरे नहीं यार फिल्म ही है, कुछ ज्यादा ही इनोवेटिव है. अलग-अलग किस्म और क्वालिटी वाले कैमरों का कोई लोकल-सस्ता सा ऐड जैसा कुछ दिखाया जा रहा है. इसके बाद डिस्क्लेमर या वार्निंग जैसा कुछ आता है. जिसमे शुद्ध राष्ट्र भाषा मे कुछ ऐसा लिखा है- कैमरा हिल सकता है, फोकस और लाइटिंग की भी दिक्कत हो सकती है, इसलिए जिसे भी बवासीर, भगंदर या...- पूरा पढ़ पाऊ इसके पहले ही वो टेक्स्ट स्क्रीन से गायब हो जाता है. मैं मन मसोस के रह जाता हूँ. वाकई कुछ बेहद नया देखने को मिलने वाला है. तय कर लेता हू की जैसे ही इसकी ओरिजनल डीवीडी आएगी, तुरंत खरीद लूँगा. अब फिल्म शुरू हो रही है और मेरी आँखें, कान, नाक, मुंह सब फिल्म से चिपक गए हैं. आस-पास की किसी और चीज़ पर ध्यान दे पाना नामुमकिन है, लव, सेक्स और धोखा डार्लिंग लव, सेक्स और धोखा. डार्लिंग, डार्लिंग, डार्लिंग...
...लग रहा है जैसे सालो बाद कुछ नया देखने को मिला है, इन्ग्लोरिअस बास्टर्ड्स, पल्प फिक्शन और पैरानार्मल एक्टिविटी भी इतनी इंट्रेस्टिंग नहीं लगी थीं. शायद देसी चीज़ का स्वाद कुछ अलग ही होता है, मुझे रानी मुखर्जी याद आ रही है.
...तो अब  इंटरवल हो चूका है, इसके पहले मैं कई बार ताली बजा चुका हूँ. पीछे बैठे इंजीनियरिंग स्टुडेंट्स ने भी इसमें खूब साथ निभाया. ज्यादातर लोग उठकर निवृत्त होने या कुछ खाने-पीने जा रहे हैं. मेरे ब्लेडर मे भी पानी भर गया है, लेकिन मैं उठकर कही नहीं जाता, इस डर से कि कही मेरे लौटने से पहले फिल्म शुरू हो गई तो?? मैं एक फ्रेम भी मिस करना नहीं चाहता. कुछ मिनट बीत चुके हैं, फिल्म अब तक शुरू नहीं हुई है. मन मे आता है कि जाकर हल्का हो आऊँ, फिर लगा कि अब तो और कम टाइम बचा है. सीट और मैं एक दुसरे से चिपके हुए है. अब छिछोरे टाइप के दो अंकल लोग अपना पॉपकॉर्न और सॉफ्ट ड्रिंक हाथ मे लिए मेरे सामने वाली सीट पर आकर बैठ जाते हैं. एक बोलता है- मेने तो का ता सापित देकने चलते हें, जाने माकडा क्या दिका रिया हे- दूसरा अंकल कोई जवाब नहीं देता. फिल्म शुरू हो चुकी है...
... जब भी कोई फिल्म देख रहा होता हूँ, और किसी दूसरे  बन्दे का रिऐक्शन मेरे मन मुताबिक नहीं होता तो लगता है, बेवकूफ साला, कुछ नहीं आता जाता इसे...
 ...तो अब फिल्म ख़तम हो चुकी है. क्रेडिट टाईटल के साथ लव, सेक्स और धोखा डार्लिंग लव, सेक्स और धोखा बजने लगता है. सम-अप सॉन्ग का विजुअल देखकर पता चलता है कि फिल्म की एक फीमेल कैरेक्टर की ज़िन्दगी का इकलौता मकसद पूरा हो गया है, यानि नैरेटिव अब तक मौजूद है, वाह भई!!! मैं अपनी सीट से उठना नहीं चाहता, लेकिन मेरे आगे की सीट वाले लोग उठकर खड़े हो गए है. और उनके कारण  मुझे गाना दिखाई नहीं दे रहा है. मजबूरी मे मैं भी उठ के खड़ा हो जाता हूँ. अपने दोनों हाथ जींस की जेबों मे समेटे हुए मैं कुछ डिवाइन सा महसूस कर रहा हूँ. सोच रहा हूँ कि यदि अगला शो दिखाया जाने वाला होता तो दोबारा टिकट खरीदकर बैठ जाता, लेकिन अफ़सोस कि ये आज का लास्ट शो है. हॉल से बहार निकलकर, सीढियां उतरते हुए अपने आस-पास के लोगो के रिऐक्शन्स  सुनना चाहता हूँ. लेकिन मुझे सिर्फ शोर सुनाई दे रहा है, कोई बात ठीक से समझ नहीं आ रही. या फिर शायद मुझे सुनाई देना बंद हो गया है. पता नहीं. पार्किंग लाट पर पहुचकर बाइक स्टार्ट करता हूँ, आस-पास की हर आवाज़ गूंजती हुई सी लग रही है. पार्किंग लाट एकदम बंद-बंद सा है. बाइक लेकर मैं सड़क पर आ जाता हूँ. 
अब ऐसा लग रहा है जैसे किसी खुले मैदान मे आ गया हूँ. घर की तरफ चल देता हूँ, रात का सवा ग्यारह बज रहा है, सड़क करीब-करीब खाली है, कोई ट्रैफिक  नहीं. मेरे अन्दर का रोबोट ड्राइविंग कर रहा है और मैं बाइक चलाते हुए अब भी फिल्म देख रहा हूँ, लव, सेक्स और धोखा डार्लिंग लव, सेक्स और धोखा. डार्लिंग, डार्लिंग, डार्लिंग...