Wednesday, July 31, 2013

आखिरी झगडा

: भाड़ में जाओ तुम!
: अरे नाराज़ क्यूँ हो रहे हो, क्या गलत कहा मैंने?

: नहीं नहीं, तुम कभी कुछ गलत कहती हो? साला मैं ही चूतिया हूँ!
: Oh please!

: क्यूँ? हिंदी में गाली बड़ी cheap लग रही होगी... नहीं?
: ओफ़... क्या हो गया है तुम्हें? कितना judge करने लगे हो!

: मैं कितना judge करने लगा हूँ, ये भी एक judgement ही है... तुम्हारा judgement.
: इतनी बुरी लगने लगी हूँ, तो छोड़ क्यों नहीं देते?

: मैंने रोक के नहीं रखा है तुम्हें!
: हाँ ठीक है यार, ख़तम करो फिर!


: साफ़-साफ़ क्यों नहीं बोलतीं कि मन भर गया है तुम्हारा?
: हाँ, भर गया है मन! ठीक है? और कुछ बुलवाना चाहते हो मुझसे?

: नहीं बस यही सुनना चाहता था मैं.

Thursday, February 2, 2012

कोरे ख़याल के सिवा कुछ नहीं

इसकी शुरुआत कब और कैसे हुई, ये तो याद नहीं, पर जितना याद है उसके हिसाब से, शायद मेरी उससे फोन पर बात हुई थी और हमने तय किया था कि हम वहीँ मिलेंगे, उसी जगह, उसी १० बाई १२ के कमरे में, जहाँ हम दोनों ने पहली बार जाना था कि दुनिया सिर्फ तभी खूबसूरत नहीं होती, जब बारिश के बाद सारी ज़मीने हरी हो जाती हैं.
ये भोपाल की बात है... हाँ भोपाल की ही बात है... लेकिन उससे फ़ोन पर मिलने की बात करके जब मैं घर लौटा तो देखा कि वो भोपाल नहीं, मेरा छतरपुर वाला घर है. वही घर जिसके पोर्च में अपने दोस्तों के साथ क्रिकेट खेलते खेलते मैं गर्मियों की पूरी छुट्टियाँ बिता दिया करता था... जहाँ मैं पापा की बाइक को इसलिए थोडा दूर पार्क कर देता था, कि गेंद लगने से कहीं उसके शीशे न टूट जाएँ.
उस दिन भी पापा से मेरी बात बाइक के बारे में ही हुई थी. शाम का वक्त था, मुझे उससे मिलने जाना था. पापा ने हमेशा की तरह मुझसे पूछा... कहीं जा रहे हो क्या? जिसका मतलब मुझे हमेशा यही समझ आया कि शायद वे खुद कहीं जाने वाले हैं. मैंने जवाब दिया, नहीं, नहीं आप बाइक ले जाइये, मुझे तो बस यहीं सड़क तक जाना है. पता नहीं उस वक्त मुझे ये याद क्यों नहीं आया कि उससे मिलने मुझे यहाँ से भोपाल जाना होगा, और भोपाल किसी अगली सड़क का नाम नहीं है.
जब मैं उससे मिलने के लिए घर से निकला तो बाहर दरवाजे पर ही एक बच्चा मिला, उसने मुझसे पूछा, घुमाने नहीं ले जाओगे? मैं बच्चों के किसी झंझट में नहीं पड़ना चाहता था, मैंने ये कहकर उसे टाल दिया कि मेरे पापा के साथ चले जाओ, उनके पास बाइक भी है. लेकिन शायद वो मेरे साथ जाने की इच्छा से ही पैदा हुआ था, इसलिए मेरी बात सुनकर वो उसी तरह मुस्कुराया जैसे कुछ अधेड़ लोग बिना ख़ुशी के मुस्कुराते हैं, मजबूरी में.
खैर मैं उसे छोड़ के आगे बढ़ गया. इसके बाद मैंने खुद को सीधे भोपाल में पाया, उसी कालोनी में, जहाँ के एक घर की तीसरी मंजिल पर वो १० बाई १२ का कमरा था. मैं उसकी उस काली स्कूटी पर पीछे बैठा था, और वो ड्राइव कर रही थी. हालाँकि ऐसा बहुत कम ही होता था कि जब हम दोनों साथ हों तो वो खुद ड्राइव करे. वो कहा करती थी, मैं तो आराम से पीछे बैठूंगी, अपनी आँखें बंद करके, तुमसे टिककर. शायद ऐसा कहते वक्त उसे ये भ्रम होता था कि मैं उसे अपने साथ बहुत दूर तक ले जाऊंगा. मैं भी उसकी ये बात मान लेता था, शायद मेरे और उसके भ्रम एक जैसे ही थे.
वो ड्राइव कर रही थी और सड़क के अगले मोड़ के बाद वो रेलवे ओवरपास आने वाला था. जिसके नीचे से गुजरते वक्त सारी आवाजें गूंजने लगती थीं और मैं उससे मज़ाक में कहता था कि सोचो अगर ट्रेन के गुज़रते वक्त ये ओवरपास टूट जाये तो क्या हो, कालोनी के सारे घरों पर पलटी हुई ट्रेन के डिब्बे लदे होंगे, जैसे किसी डिजास्टर फिल्म का पहला या अंतिम शाट हो. इस पर उसका जवाब क्या होता था, मुझे याद नहीं आ रहा.
लेकिन हम उस ओवरपास तक पहुँच ही नहीं पाए, उसके पहले ही हमारी स्कूटी किसी से टकरा गई. पता नहीं वो ठीक से ड्राइव नहीं कर पा रही थी, या फिर सड़क पर कुछ ज्यादा ही गढढे थे. स्कूटी जिस आदमी से टकराई थी, वो ज़मीन पर गिर पड़ा था. हालाँकि टक्कर इतनी हलकी थी कि किसी को चोट लगने का सवाल ही पैदा नहीं होता था. फिर भी वो ऐसे कराह रहा था, मानो जिंदगी भर की सारी चोटें उसे आज ही लगी हों. मैंने स्कूटी से उतरकर उसे उठाया, उसके कपड़ो की धूल झाडी और उससे माफ़ी मांगी. पर वो भड़क गया और मुझे घूरते हुए धमकी दी... देख लूँगा मैं उसे, जानता हूँ मैं, किसी अखबार में काम करती है वो. अब भड़कने की बारी मेरी थी. मैंने उसकी कालर पकड़ ली. वैसे ही जैसे सारे सिविलाइज्ड लोग किसी को डराने के मकसद से किया करते हैं. मैंने देखा कि इसके बाद वो ठंडा पड़ गया और कुछ नहीं बोला. मैंने ये भी देखा कि इस दौरान वो अपनी स्कूटी लेकर वहां से चली गई.
इसके अगले ही पल मैंने खुद को फिर छतरपुर वाले घर के बाहर पाया. वही घर जिसके अन्दर की ठंडी हवा में बैठकर दादी दिन भर चिल्लाती थीं कि... अरे नालायकों, इतनी धूप में क्रिकेट मत खेलो, तबियत ख़राब हो जाएगी.
लेकिन मैं घर के अन्दर नहीं गया, मुझे उससे पूछना था कि आखिर वो ऐसे अचानक क्यों चली गई. मुझे डर था कि अब शायद मैं कभी दोबारा उससे मिल नहीं पाउँगा. पर जाने क्यों मुझे ये भी लगता था कि अगर मैं उससे एक बार ठीक से बात कर लूं तो शायद हम फिर मिल सकें, उसी कमरे में, जो बस १० बाई १२ का था और जहाँ हमने एक-दूसरे को पूरा किया था.
इसलिए मेरा उससे बात करना बहुत ज़रूरी था. मैंने जेब से अपना फ़ोन निकाला. लेकिन आजकल मेरा फ़ोन ठीक से काम नहीं कर रहा है, उसकी स्क्रीन की सेंस्टिविटी कुछ बिगड़ गई है, मैं फ़ोनबुक में उसका नंबर ढून्ढना चाहता हूँ, लेकिन वो मिल नहीं रहा. अजीब बात ये है कि मुझे उसका नंबर याद भी नहीं आ रहा. जबकि अपने नंबर के अलावा सिर्फ एक उसी का नंबर था जो मुझे याद हुआ करता था.
मैं परेशान हो चुका हूँ और इतना हडबड़ाया हुआ हूँ कि मुझे पसीना आ रहा है. मुझे अच्छी तरह पता है कि अगर मैंने उसे अभी फ़ोन नहीं किया तो फिर सब ख़तम हो जायेगा. न वो कमरा बचेगा और न हरी ज़मीनों के पार कुछ दिखाई देगा.
मैं अपने फ़ोन को खोलकर सिमकार्ड बाहर निकाल लेता हूँ. हाँ, मुझे पता है कि फ़ोन को सुधारने का ये कोई तरीका नहीं है, लेकिन अभी मेरे पास कोई और तरीका है ही कहाँ.
मैंने देखा कि वहां से थोड़ी ही दूर एक दुकान है, शायद वहां मेरा फोन सुधर सकता है. पसीने से नहाया मैं दौड़ते हुए उस दुकान तक पहुंचा, पर वहां मोबाइल रिपेयर नहीं होते थे. वो एक पीसीओ था. मुझे याद आया कि सालों पहले जब हमारे घर में लैंडलाइन फ़ोन नहीं था और मोबाइल को हमने बस आशीष विद्यार्थी के सीरिअल 'दास्तान' में देखा था, उस वक्त मैं कभी कभी इस पीसीओ में कोई ज़रूरी कॉल करने आता था.
खैर, मैं पीसीओ के अन्दर गया, लेकिन वहां काफी भीड़ थी, मैंने अपने आगे खड़े आदमी से कहा, भाई साहब मुझे बहुत ज़रूरी फ़ोन करना है, प्लीज़...! उसने फ़ोन मेरी तरफ बढाया और धीमे से बोला, हाँ कर लो, बड़े दिनों बाद आये हो. मैंने उसका चेहरा देखा, जो काफी जाना पहचाना था, लेकिन मुझे उसका नाम याद नहीं आया.
आखिरकार मैंने उसे कॉल किया. मुझे अब भी उसका नंबर याद नहीं आया था, पर जाने कैसे फोन लग गया. मेरी बात हुई उससे, हालाँकि ज्यादा देर तक नहीं, पर हुई. उसने मुझसे पूछा कि मैं बदल गई हूँ ना? फिर मेरा जवाब सुने बिना उसने बस इतना ही कहा कि वो मुझे काला घोडा फेस्टिवल में मिलेगी, उसे वहां कवरेज करना है.
मैं बस इतना ही सुनकर संतुष्ट हो गया. अब मुझे बिलकुल पसीना नहीं आ रहा था और सारी  हडबड़ाहट भी ख़तम हो गई थी. हालाँकि मुझे कोई अंदाजा नहीं था कि ये काला घोडा फेस्टिवल क्या चीज़ है, और कहाँ होता है.

इसके बाद मुझे बस इतना याद है कि मैं रोहित खिल्नानी के साथ बैठकर मिटटी के कुल्हड़ में मीठा दही पी रहा था. रोहित पहले एनडी टीवी मुंबई का रिपोर्टर था और आजकल कोई एंटरटेनमेंट सोल्यूशन कम्पनी चलाता है. उसने बताया था, कि काला घोडा फेस्टिवल में हर तरह के लोग आते हैं, वो भी जिन्हें लगता है कि वो बदल गए हैं, और वो भी जो जानते हैं कि बदल जाना एक कोरे ख़याल के सिवा कुछ नहीं है.

Wednesday, November 2, 2011

मूर्ति

एक पति-पत्नी को अपने एक दोस्त की शादी में जाना था. उनका अंदाजा था कि लौटने में काफी देर हो जाएगी. दो बच्चे भी थे उनके, एक 6 साल का और एक 8 का. पति-पत्नी ने तय किया कि बच्चों को साथ नहीं ले जायेंगे, क्योकि शादी की भीड़-भाड़ और नाच गाने में छोटे बच्चों को सम्हालना बड़ा मुश्किल होता है. तो उन्होंने अपने एक पडोसी, जो उनके अच्छे दोस्त भी थे, से मदद मांगी. पडोसी रात में उनके घर पर बच्चों के साथ सोने को तैयार हो गए.
रात को पडोसी की जगह उनकी बड़ी बेटी आई. उसने बताया कि घर पर अचानक कुछ मेहमान आ गए हैं , इसलिए डैडी की जगह मैं आपके घर पे रुक जाउंगी. पति-पत्नी अपने दोनों बच्चों को पडोसी की बड़ी बेटी के सहारे छोड़ के शादी में चले गए.
उनके जाने के बाद पडोसी की बेटी वक्त बिताने के लिए टीवी देखने लगी. बच्चे तो पहले ही अपने कमरे में सो चुके थे. रात को करीब 1 बजे के बाद उसे भी नींद आने लगी. वो बेडरूम में पहुंची, नाईट लाईट जल रही थी, हलकी नीली रौशनी थी. बच्चों के बेड के बगल में ही उसके लिए भी एक बेड लगा हुआ था. वो लेट गई. तभी उसका मोबाईल बजा, उन्हीं पति-पत्नी का फ़ोन था.

"कैसी हो बेटा? सब ठीक? कोई प्रॉब्लम तो नहीं है?"
"नहीं अंकल, सब ठीक है."
"वो दोनों सो रहे हैं ना?"
"हाँ, आराम से."
"चलो ठीक है फिर, तुम भी सो जाओ, रखता हूँ मैं."
"अरे अंकल... सुनिए... एक... बात पूछनी थी...."
"हाँ बेटा... क्या, बोलो?"
"एक्चुली वो... यहाँ कमरे में कपबोर्ड के बगल में जो लम्बी सी मूर्ति रखी है न... जिस पर आपने शायद शाल ओढाया हुआ है... उसे मैं ज़मीन पे लिटा दूं क्या... उसकी आँखें थोड़ी चमक रही हैं... इसलिए अजीब सी लग रही है... उसके कारण नींद नहीं आएगी मुझे..."
दूसरी तरफ से कोई जवाब नहीं आया, कुछ पलों तक चुप्पी छाई रही... फिर पति ने घबराई हुई आवाज़ में कहा, "तुम दोनों बच्चों को लेकर अपने घर भाग जाओ बेटा... हमारे बेडरूम में कोई मूर्ति नहीं है...."

बाद में उस बेडरूम में पडोसी क़ी बड़ी बेटी और दोनों बच्चों क़ी खून से सनी हुई लाशें मिलीं और वो मूर्ति आज तक किसी को नहीं मिली.

Wednesday, August 31, 2011

Email


बहुत दिनों से तुमसे बहुत सारी बातें कहने का मन था. इसलिए आज ये mail लिख रहा हूँ. पता नहीं कि...
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ऊपर की खाली जगह पर मैंने दुनिया भर की बकवास लिखी थी, जो तुम्हे mail करने के पहले मैंने जान-बूझकर delete कर दीं.
लिखा इसलिए था, क्योकि लग रहा था कि यदि मैंने ये सब किसी से भी नहीं बताया तो मेरा सर फट जायेगा, और मेरे दिमाग के चीथड़े उड़ जायेंगे. 
delete इसलिए कर दिया क्योकि तुम उसे पढ़ भले ही लेतीं पर मुझे शक है कि जो मैं कहना चाह रहा था, तुम वो समझ पातीं. और मुझे इस पर भी शक है कि तुम्हारे वो पढ लेने से कोई फर्क पड़ता.

Monday, July 25, 2011

तलहटी पे बसना गवारा नहीं मुझे

ख्वाहिशों के दर्रे पर यूं दौड़ना नंगे पाँव
सनक ये साली फितरतों में बसी है कहीं,

कुछ बेतरतीबी ज़रूर होगी मेरी चाल में
पर ये कशीदगी है तुम्हारे ओढ़े हुए सधेपन से मेरी,

हाँ मैं भी घबराता हूँ पैरों पे पड़ते छालों से
लेकिन तुम्हारी तरह यूं तलहटी पे बसना गवारा नहीं मुझे,

जानता हूँ मैं, इन टूटी-फूटी ज़मीनों के पार सब्जबाग है मेरा
उसकी पत्तियों की महक अक्सर आ जाती है यहाँ,

तुम यहीं बैठकर देखो अपना उगता सूरज हर रोज़
मेरा आसमां अभी ढेरों बाकी है...

Saturday, June 18, 2011

डायरी

11:50 PM, 28/MAY/2011

डायरी,
आज 28 मई है, उसकी मौत को पूरा एक साल हो गया आज. 6 साल की थी उस वक्त वो. अचानक ही हुई थी उसकी मौत, कोई बीमारी नहीं थी उसे, बस एक दिन अचानक उसके स्कूल से फ़ोन आया, उसकी मम्मी ने उठाया, मैं तो उस वक्त ऑफिस में था, बताया गया कि वो बेंच पर बैठे बैठे ही बेहोश हो गई, हम दोनों किसी तरह भागे-भागे स्कूल पहुंचे, तब भी वो बेहोश ही थी, उसे हॉस्पिटल लेकर गए, लेकिन डॉक्टर ने 8-10 मिनट में ही कह दिया कि she is no more. बाद में पता चला कि हॉस्पिटल पहुँचने से पहले ही उसकी जान निकल चुकी थी. हम दोनों ये समझ ही नहीं पाए कि स्कूल से हॉस्पिटल के रास्ते किस पल वो हमें छोड़ के चली गई.
15 अगस्त को उसका बर्थ डे आने वाला था. हम दोनों उसे प्यार से बेटू कहा करते थे. हमारी बेटू.
कहने को तो एक साल हो गया उसे गए, लेकिन मुझे आज भी लगता है कि एक दिन जब मैं ऑफिस से लौट के घर की कॉल बेल बजाऊंगा तो वो अपने विडियोगेम का रिमोट हाथ में लिए दरवाज़ा खोलेगी, और फिर जिद करके मुझे अपने पास बिठा लेगी, कि नहीं... नहीं...नहीं आप भी मेरे साथ खेलो ना पापा... प्लीज़.
कई बार सोचता हूँ, कि आखिर ऐसा क्या हुआ था उसे, जो अचानक कुछ ही मिनटों में सब खत्म हो गया. डॉक्टर ने बताया था कि मौत दिल की धड़कन रुकने से हुई थी, लेकिन क्या 6 साल की छोटी सी बच्ची की मौत की ये वजह झूठ नहीं लगती?
सोचा था कि अच्छे से अच्छे डॉक्टर से बात करूंगा, पर उसकी मौत की सच्ची वजह पता कर के रहूँगा... लेकिन एक दो डॉक्टर्स से मिलने के बाद ही लगने लगा, कि मैं उनका और अपना दोनों का वक्त ज़ाया कर रहा हूँ. 
वैसे भी, अगर कोई डॉक्टर सही वजह बता भी देता तो क्या फर्क पड़ जाता? बेटू वापस तो नहीं आ जाती? अब तो उसकी मम्मी ने भी मान लिया है कि शायद दिल की धड़कन ही रुकी होगी, या शायद हम दोनों ने. 
उसके पीले रंग के वो जूते हमने अब भी सम्हाल के रखे हैं, उसे बहुत पसंद थे वो. नीचे वाले फ्लैट के डॉ. सहाय की बेटी मीनू के जूते देख कर उसने जिद पकड़ ली थी, कि उसे भी बिकुल वैसे ही चाहिए, और जब मैं उसे लेकर बाज़ार गया, तो मीनू के जूते भूल कर उसने ख़ुशी-ख़ुशी अपने लिए ये पीले जूते पसंद कर लिए. 
फिर वो हर वक्त इन्हें ही पहने रहती, यहाँ तक कि रात को बिस्तर पर जाते वक्त भी नहीं उतारती, फिर जब उसकी आँख लग जाती, तो मैं चुपचाप उन्हें उतारता था. दिन भर जूते पहने रहने के कारण उसके पंजों में कुछ देर के लिए निशान से पड़ जाते, मैं उन्हें सहलाते हुए दूर करता. 
जब वो मेरी किसी चीज़ से बहुत खुश हो जाती तो कहती कि बड़ी होकर वो मुझसे ही शादी करेगी, इस बात पर उसकी मम्मी उसे चिढाया करती कि जब तक वो बड़ी होगी, तब तक तो पापा बुड्ढे हो जायेंगे, और फिर उसे बुड्ढे पापा से शादी करनी पड़ेगी. इस बात पर वो बहुत नाराज़ हो जाती और तब तक नहीं मानती, जब तक उसे उसका फेवरेट ऑरेंज जैम जी भर कर खाने की इजाज़त न मिल जाए. हमें इस तरह ब्लैकमेल करना उसे खूब आता था. 
मुझे याद है, एक बार उसने मुझसे पूछा था कि पापा आप सहाय अंकल की तरह दोपहर में ही घर क्यों नहीं लौट आते? मैंने उसे समझाया कि बेटू पापा को ऑफिस में बहुत काम करना पड़ता है, बस इसीलिए. ये सुनकर उसने हाँ में सिर ज़रूर हिलाया था पर शायद मेरी बात का मतलब वो समझ नहीं पाई थी, अपनी मम्मी से भी वो यही शिकायत करती कि पापा जल्दी घर नहीं आते. 
अब सोचता हूँ कि काश मैंने उसे कुछ और वक्त दिया होता... काश उसके साथ रोज़ विडियो गेम खेला होता...
वैसे अब उसे याद करते हुए मुझे रोना नहीं आता, बस कुछ पलों के लिए एक खालीपन सा उभर आता है....... नहीं... नहीं...नहीं आप भी मेरे साथ खेलो ना पापा... प्लीज़.

Friday, June 17, 2011

मन हल्का करने वाली चीज़


शाम के 7.30  बज रहे हैं, मैं अभी-अभी office से निकला हूँ और बहुत भूखा हूँ, जल्दी-जल्दी 7 number stop पहुँचता हूँ, मसालेदार आलू, cheese, और तवे पर गर्म होते butter की खुशबू से महक सा जाता हूँ. Sagar Gaire Fast food Corner. 
लोग Sandwich खरीदने के लिए Q में खड़े हैं, लड़के, लडकियां, बच्चे सब, मैं भी हाथ में prepayment की रसीद लिए उनके साथ Q में हूँ. एक बड़े से तवे पर उसने ढेर सारा butter फैला रखा है. उस पर 12-15 sandwich तैयार हो रहे हैं, तीन bread slices के बीच में भरा हुआ cheese और मसालेदार mashed आलू बाहर झाँक रहा है.
लोग बिलकुल तैयार खड़े हैं, इंतज़ार करना मुश्किल हुआ जा रहा है. कुछ का सब्र जवाब दे रहा है... 'भैया जल्दी करो, कितनी देर से खड़े हैं यार'
लेकिन वो किसी की आवाज़ पर ध्यान नहीं देता और किसी जुनूनी साधु की तरह sandwich बनाने की अपनी तपस्या में डूबा रहता है, 
अब वो तैयार हो चुके sandwiches को एक-एक कर के बगल में खड़े अपने साथी के सामने रख रहा है, जो उनमे फटाफट एक-एक cheese slice लगाने में जुटा है, उस बन्दे मे गज़ब की फुर्ती है, वो पन्नी में लिपटी cheese slices को एक ख़ास लय में इतनी तेज़ी से और इतनी महारथ के साथ बाहर निकाल रहा है, जैसे उसने इसका कोई course कर रखा हो. 
वो एक-एक करके पूछता जाता है, pack करना है??? खाना है??? उसके हाथ अभी भी उतनी ही तेज़ी से चल रहे हैं, वो एक बड़े से चाक़ू से sandwich के दो टुकड़े करता जाता है और pack करवाने आए लोगो को पहले देता है. जिन्हें pack नहीं कराना है, बल्कि यहीं खाना है, वो कुढ़े जा रहे हैं, मैं भी उनमे से एक हूँ.
आख़िरकार चांदी की तरह चमकती paper plate पर रखा कोई बारहवां-तेरहवां sandwich मेरे हिस्से आता है, उसे हाथ में लेकर पल भर के लिए मैं किसी सम्राट जैसा महसूस करता हूँ, जैसे दुनिया जीत ली हो, 
कुछ लोगो को अब भी इंतज़ार करना पड़ेगा, क्योकि तवा खाली हो चुका है. ये लोग बडबडाने  लगते हैं... 'क्या यार'... 'अब फिर उतना टाइम'... 'मैं पहले से खड़ा हूँ यार'... 'हद है'... 'मेरे चार थे फिर भी'....
बारह- पंद्रह sandwiches की अगली खेप तवे पर तैयार होने आ गई है. 
मैं वहां से आगे बढ़ के अपने sandwich को खाने के लिए हाथ में उठाता हूँ, उसकी करारी सतह दब कर खुल जाती है और cheese slice बाहर plate पर गिरने लगती है, मैं आराम से उसे सम्हालता हूँ और स्वाद लेना शुरू करता हूँ. tomato sauce, butter, bread, cheese, आलू, हरी चटनी, सब पूरी एकता के साथ एक plate पर हैं. 
जीभ और मन दोनों खुश हो रहे हैं. लग रहा है जैसे जी भर के रोने के बाद कोई मन हल्का करने वाली चीज़ खाई हो. ये sandwich सचमुच इस शहर की सबसे अच्छी चीज़ों में से एक है. 
सागर गैरे ने अपना धर्म निभा दिया है.

Wednesday, April 6, 2011

रात छिपकली


आधी रात का वक़्त है, शायद 2 -3  बजे का. Bike बहुत तेज़ी से, चुप्पी सी साधे चली जा रही है. थोड़ी देर बाद अचानक break लगता है, और जैसे सब कुछ रुक जाता है. 
वो बड़ी मुश्किल से अपना helmet उतार पाता है, उसे उल्टी होने वाली है. वो उतरने के लिए bike का stand लगाता ही है कि खुद को रोक नहीं पाता और एक तरफ झुक कर, बाइक पर बैठे-बैठे ही उल्टी कर देता है.  
वो उल्टी कर रहा है, खुद को ठीक से सम्हाल नहीं पा रहा है. उसके हाथ से helmet छूट कर सड़क पर लुढ़क गया है.
सड़क के दूसरी तरफ, divider के उस पार इसी वक्त एक कार निकलती है. 
उसकी उल्टी बंद हो चुकी है, और वो धीरे-धीरे हांफ रहा है. उसकी आँखें गीली हो गई हैं, और बहुत पसीना आ रहा है. उल्टी के बाद गले में जम आई खराश को वो बार-बार थूक रहा है. उल्टी के छीटों से उसका एक जूता गन्दा हो चुका है. 
वो रूमाल निकाल कर मुंह पोछता है, बैग से पानी की बोतल निकाल कर अपने सर पर उड़ेल लेता है और सड़क पर लुढके helmet की तरफ नज़र डालता है. 
फिर पीछे मुड़कर देखता है, उस कार की तरफ, जो थोड़ी दूर जाकर एक street lite के नीचे खड़ी हो गई है. वो bike को start किये बिना, धकेलते हुए helmet के पास तक ले जाता है और उसे उठाकर handle पर टांग लेता है. फिर ignition on करके वो एक बार फिर कार की तरफ मुड कर देखता है. 
अब कार के आगे के दोनों दरवाज़े खुल गए हैं और दो-तीन लोग बाहर आकर एक दूसरे से गुत्थम-गुत्था होते दिख रहे हैं, शायद उनमे एक औरत भी है. 
पता नहीं क्या हो रहा है.
उसके चेहरे पर बड़े-बड़े लफ़्ज़ों में लिखा है who cares
वो bike start करता है और वहां से निकल जाता है.
..............
वो घर पहुँच चुका है और दरवाज़े के ताले में चाबी डालने की कोशिश कर रहा है, लेकिन अँधेरा होने के कारण ठीक से कुछ दिखाई नहीं दे रहा. आखिरकार चाबी ताले के अन्दर चली जाती है, लेकिन हमेशा की तरह उसने चाबी को गलत तरफ घुमाया है, लेकिन जब तक उसे ये समझ में आता है, ताला खुल चुका होता है. उसके हाथ को ये पुरानी गलती बार-बार सुधारने की आदत पड़ चुकी है. 
वो अन्दर आता है, सारे कपडे और जूते उतारकर नंगा हो जाता है और kitchen से पानी की बोतल लेकर पूरी गटक जाता है. 
अब वो basin के आईने में खुद को देख रहा है. 
उसे अपना चेहरा सूजा हुआ सा दिख रहा है और ऐसा लग रहा है जैसे उसके होंठ और ज्यादा मोटे हो गए हों. उसे अपने बाल भी अजीब लग रहे हैं, सूखे और एक दूसरे से बुरी तरह चिपके हुए. उसे महसूस होता है कि आजकल वो बहुत बेढंगा दिखने लगा है. 
वो basin का tap on करता है और चेहरे पर पानी उछालता है. वो बहुत देर तक अपनी आँखें धोता रहता है. लेकिन फिर भी उनकी किरकिरी ख़तम नहीं होती. वो basin में ही अपने बाल भी गीले कर लेता है. 
वो फिर से खुद को आईने में देखता है, उसका चेहरा अब ज्यादा साफ़ दिख रहा है, और बालों से पानी की बूँदें टपक रही हैं, लेकिन उसे महसूस होता है कि खुद को इस तरह धो लेने के बाद भी उसके बेढंगेपन में कोई कमी नहीं आई है. उसे ये भी अजीब लगता है कि उसके कई हफ़्तों से अपने सीने के बाल shave नहीं किये हैं. 
अचानक वो तय करता है कि बहुत हो गया, ऐसे नहीं चलेगा. वो अपना razor उठता है और shower के नीचे आकर खड़ा हो जाता है. पानी बहुत ठंडा है, लेकिन वो shower बंद नहीं करता. shave करते वक़्त वो सोच रहा है कि उस कार में वो लोग कौन थे, वो औरत कौन थी?
पता नहीं कोई औरत थी भी या उसे बस धोखा हुआ है.
Shave के बाद वो shampoo की बोतल उठाता है. उसे इस shampoo की खुशबू बहुत पसंद है, हथेली पर ढेर सारा लेकर वो उसे अपनी नाक के करीब लाकर सूंघता है. ये shampoo दिखता भी बहुत खूबसूरत है, transparent और गाढ़ा, बेहद मुलायम सा. वो हथेली पर पड़े shampoo को चखने की कोशिश करता है, लेकिन इसका स्वाद बहुत ख़राब है. वो उसे थूक देता है और फिर बहुत देर तक shower के नीचे खड़ा रहता है. कितना सुकून मिल रहा है. 
Bathroom से बाहर आकर वो खुद को अपने उस blue towel से पोछता है और फिर पंखे के नीचे आकर खड़ा हो जाता है. खुद को आईने में देखता है, उसकी आँखे बहुत लाल हैं और दर्द कर रही हैं. लेकिन फिर भी उसे अच्छा  लग रहा है. बाल अब तक पूरी तरह सूखे नहीं हैं, लेकिन वो गीले बालों पर ही brush कर लेता है. 
उसने कपडे नहीं पहन रखे हैं, और पंखे की हवा बहुत तेज़ है. उसे हलकी ठण्ड भी लग रही है, लेकिन वो पंखे को धीमा नहीं करता. 
सुबह के 5 बजने वाले हैं.
वो टीवी ऑन करता है, TCM पर कोई फिल्म आ रही है, शायद क्युब्रिक की लोलिता. लेकिन वो काफी थका हुआ है, इसलिए टीवी mute कर के बिस्तर पर निढाल हो जाता है. 
पंखा अब भी उतना ही तेज़ चल रहा है और हमेशा की तरह आज फिर उसे लग रहा है, कि अभी ये पंखा आकर उस पर गिरेगा और उसके हाथ-पैर कट जायेंगे और कमरे की सारी दीवारें लाल हो जाएँगी. 
ये डर उसके मन में बचपन से ही है, पता नहीं कहाँ से आया है.
उसे फिर से हलकी ठण्ड महसूस हो रही है.
....................
दोपहर का वक़्त है. तेज़ धूप है. वो एक petrol pump पर अपनी bike के साथ खड़ा है, लेकिन उसे याद नहीं आ रहा कि उसने petrol भरवा लिया है या नहीं. 
उसे हलकी ठण्ड भी लग रही है, जबकि धूप बहुत तेज़ है. 
एक कार petrol pump की तरफ आती हुई दिखाई देती है, बिलकुल कल रात जैसी. वो कार उससे थोड़ी दूरी पर आकर रुक जाती है, और उसमे से एक लड़की बाहर आती है. 
वो उसी की तरफ देख रही है, उसके होंठ कत्थई रंग के हैं, वो उसके करीब आ रही है.
लड़की का चेहरा जाना-पहचाना सा लग रहा है, लेकिन उसे उसका नाम याद नहीं आ रहा. वो काफी करीब आ जाती है और अचानक उसके ऊपर उल्टी कर देती है, वो सकपका कर रह जाता है. 
उसके पैर लड़की की उल्टी में सन चुके हैं और अब petrol pump पर खड़ा हर आदमी उसे घूर रहा है, जैसे सारी गलती उसी की हो.
वो लड़की भी उसी को घूर रही है, उसके हाथों में वही blue towel है. 
उसे समझ में नहीं आ रहा कि आखिर ये हो क्या रहा है.
उसे अब भी हलकी ठण्ड लग रही है.

Saturday, October 23, 2010

...!

पिता, जो माँ की तरह किसी छोटी-मोटी बात पर गले नहीं लगाते,
लेकिन कनखियों से देख कर सब समझ जाते हैं.

पिता, जो कभी कमज़ोर नहीं पड़ते,
फिर चाहे हालात कैसे भी हों.
वो जानते हैं, कितना अहम है उनका होना, सबके लिए,
बस इसीलिए, डटे रहते हैं, हमेशा.

पिता, जो जानते हैं, कितनी मुश्किल है दुनियादारी,
बस इसीलिए, ज़रा सख्त बने रहते हैं, हमेशा.

पिता, जो सबके सुकून के लिए खर्च करते रहते हैं खुद को, सुबह से शाम, पूरी ज़िन्दगी,
शायद इस उम्मीद में कि एक दिन वो सब खड़े होंगे अपने पैरों पर, उन्हीं की तरह.

Saturday, July 31, 2010

Poor Fellows

What it takes on this planet, 
to make love to each other in peace. 
Everyone pries under your sheets, 
everyone interferes with your loving. 
They say terrible things about a man and a woman, 
who after much milling about, 
all sorts of compunctions, 
do something unique, 
they both lie with each other in one bed. 
I ask myself whether frogs are so furtive, 
or sneeze as they please. 
Whether they whisper to each other in swamps about illegitimate frogs, 
or the joys of amphibious living. 
I ask myself if birds single out enemy birds, 
or bulls gossip with bullocks before they go out in public with cows. 
Even the roads have eyes and the parks their police. 
Hotels spy on their guests, 
windows name names, 
canons and squadrons debark on missions to liquidate love. 
All those ears and those jaws working incessantly, 
till a man and his girl 
have to raise their climax, 
full tilt, 
on a bicycle.


By
PABLO NERUDA

Wednesday, July 28, 2010

Turn The Searchlight Within

Everything in my life is a reflection of who I am in this moment. I recognize my own influence on my difficulties, disappointment, and lack. I no longer look outside myself for causes and solutions, but turn the searchlight within. When I do this, I banish my helplessness and step into the power of my own.


Courtesy- The Deeper Secret 
by Annemarie Postma

Saturday, July 17, 2010

Love Sex Dhokha Murder


इस गाने का छिछोरापन मुझे इतना पसंद है कि मैं बस इसे यहाँ दोहराना चाहता हूँ, बेवजह लिख कर ही सही, यू ट्यूब लिंक देकर ही सही, पर दोहराना चाहता हूँ. 

तुझे गोली मारूंगा....
तेरी जान बचाऊंगा...
तुझे गोद सुलाऊंगा...
तेरी नींद उड़ाऊँगा...
तुझे गोली मारूं, जान बचाऊँ, गोद सुलाऊँ, नींद उडाऊं
सांस ये मेरी भाप है बेबी गरम अगन का झोंका
काट के रख दूंगा गर तूने जुड़ने से रोका...
लव सेक्स और धोखा डार्लिंग - लव सेक्स और धोखा
लव सेक्स और धोखा डार्लिंग - लव सेक्स और धोखातस्वीर उतारूंगा, मेले मे दिखाऊंगा
जो देखेगा उसकी अँखियाँ नुचवाऊंगा
तस्वीर उतारूं, मेले मे दिखाऊं, जो देखे उसकी अंख नुचवाऊं
हवस की तरकारी मे डाला जलन-भुनन का छौका
काट के रख दूंगा गर तूने जुड़ने से रोका...
लव सेक्स और धोखा डार्लिंग - लव सेक्स और धोखा डार्लिंग
लव सेक्स और धोखा डार्लिंग - लव सेक्स और धोखा
तुझे गोली मारूंगा...
तेरी जान बचाऊंगा...
तुझे गोली मारूं, जान बचाऊँ, गोद सुलाऊँ, नींद उडाऊं
सांस ये मेरी भाप है बेबी गरम अगन का झोंका
काट के रख दूंगा जो तूने जुड़ने से रोका...
लव सेक्स और धोखा डार्लिंग - लव सेक्स और धोखा
लव सेक्स और धोखा डार्लिंग - लव सेक्स और धोखा



Friday, July 16, 2010

कमबख्त रेलवे का e-ticket

मैं जल्दी-जल्दी स्टेशन की सीढियां चढ़ रहा हूँ...हडबडाया हुआ हूँ...पीठ पर लदा बैग अचानक बहुत भारी लगने लगा है... 10 मिनट मे ट्रेन जाने वाली है और मुझे अभी-अभी बताया गया है कि मेरा e-ticket confirm नहीं हुआ है इसलिए नियम के मुताबिक cancel हो गया है... अब मुझे मजबूरन general ticket लेना पड़ेगा और फिर TC को fine और रिश्वत दोनों देना पड़ेगा, ताकि मुझे एक passenger ही माना जाए, बिना टिकट वाला नहीं...
इस वक्त मैं बहुत शिद्दत से IRCTC के head office मे एक bomb plant करना चाहता हूँ...
तो जल्दी-जल्दी general ticket खरीदता हूँ और उसे ले के platform  पर खड़े TC के पास जाता हूँ, उसे अपने e-ticket का printout दिखा के सारा हाल बताना चाहता हूँ, लेकिन मैं कुछ बोल पाऊँ इससे पहले ही वो मोटी तोंद वाला TC अपना एक हाँथ थोडा ऊपर उठाता है और डमरू बजाने वाले अंदाज़ मे हिलाते हुए कहता है...
''इधर AC मे कोई berth नहीं है, वहाँ sleeper मे जा के देखिये''
यानि अब मुझे पूरी रात sleeper coach की उमस मे सफ़र करना होगा, उस पर तुर्रा ये कि अब तक मेरे पास कोई berth भी नहीं है. एक बुरे सफ़र की इससे अच्छी शुरुआत और क्या हो सकती है. पता नहीं लोग शादी क्यों करते हैं (इस train से मैं अपने cousin की शादी मे जा रहा हूँ.)
खैर मैं हारकर वापस मुड़ता हूँ और मन ही मन उस TC की सातों पुश्तों को गरियाता हूँ, फिर बेवजह ममता बनर्जी और पूरे देश के railway system को कोसता हूँ (हम media वाले दूसरो के काम मे नुक्स निकालने और उन्हें कोसने मे माहिर होते हैं)
अब मैं sleeper coach की तरफ बढ़ रहा हूँ, मेरा mood off हो चुका है, मेरी शर्ट करीब-करीब पूरी भीग चुकी है, और मेरा बेचारा रूमाल इस कदर गीला हो चुका है, कि निचोड़ा जा सकता है. मुझे इतना पसीना क्यों आ रहा है, जबकि इस वक़्त शाम का सात बजा हुआ है और हलकी ठंडी हवा चल रही है.
मैं sleeper के TC को ढूँढ रहा हूँ, लेकिन वो न जाने कहाँ मर गया है. मेरी हालत इस वक्त काफी खराब है, लेकिन मुझे खुद के बजाय इसके TC पर तरस आ रहा है. सोच रहा हूँ कि वो बेचारा कुछ हरी पत्तियाँ कमाने के लिए किसी बकरे की तलाश मे कही इधर-उधर गया होगा, जबकि मैं यहाँ कितने भी पैसे दे के एक side lower berth (मुझे इसके अलावा कोई और berth पसंद नहीं) के लिए हलाल होने को तैयार खडा हूँ.
Time देखता हूँ, 15 मिनट बीत चुके है लेकिन ट्रेन अब भी चुपचाप खड़ी है. यानी पहले स्टेशन से ही लेट होना शुरू. मैं फिर से ममता बनर्जी और railway system को कोसना चाहता हूँ, लेकिन सामने से एक खूबसूरत लड़की अपना भारी सा बैग लिए चली आ रही है. लेकिन वो मेरी तरफ देखती भी नहीं है (हे भगवान्, ऐसा कैसे हो सकता है आखिर!) और बगल से निकल कर आगे बढ़ जाती है. शायद उसका reservation AC coach मे है. उसकी हलकी सी खुशबू आई, अच्छी थी, कुछ जानी-पहचानी सी (शायद हमारा deo same होगा... उफ़ मैं इतने अंदाजे क्यों लगाता हूँ)  मैं मुड़कर उसे एक नज़र देखता हूँ, उसकी T-shirt पर पीछे लिखा हुआ है... better luck next time!
हद हो गई यार, एक पल के लिए तो मन किया कि उसके पास जाऊं और कहूं कि इस e-ticket की मेहरबानी ना होती तो शायद मैं उसके साथ एक ही coach मे बैठा होता और फिर बताता कि better luck किसे कहते हैं.
 खैर... उसे भूलकर मैं general ticket के साथ पूरी बेशर्मी से sleeper coach मे चढ़ता हूँ, खाली पड़ी एक side lower berth देखता हूँ, उसके सामने अपना बैग पटकता हूँ और berth पर आराम से बैठ जाता हूँ, फिर बैग के pocket से earpiece निकाल कर अपने कानो मे लगा लेता हूँ और एक FM पर आ कर रूक जाता हूँ,
रांझा रांझा कर गई वे मैं...
पांच-छः मिनट के लिए मैं सब भूल जाता हूँ. गाना ख़त्म होते ही कोई जोकर RJ अपनी बकवास शुरू कर देती है. मैं earpiece निकाल कर रख देता हूँ. इन पांच-छः मिनटों मे मुझे जो राहत मिली उसके लिए मैं रहमान, गुलज़ार, अनुराधा श्रीराम और रेखा भारद्वाज को गले लगाना चाहता हूँ.
Train चल चुकी है (15 मिनट से ज्यादा लेट ), खिड़की से आने वाली हवा बहुत सुकून भरी है. मैं आराम से बैठा ज़रूर हूँ लेकिन अपने चारो तरफ बैठे लोगो को देख के सोच रहा हूँ कि अभी कोई आकर ticket के बदले इस berth पर अपना हक़ जताएगा और मुझे मजबूरन उठना पड़ेगा. लेकिन फिर सोचता हूँ कि ठीक है यार, इतना परेशान क्या होना, देखा जायेगा.
तो दो station निकल चुके है, train चले हुए तकरीबन डेढ़ घंटे बीत चुके हैं, किसी ने भी आकर berth पर हक़ नहीं जताया है. मैं अब तक डेढ़ बोतल पानी और दो फ्रूटी (मेरी पसंदीदा) पी चुका हूँ, बहुत सारे गाने सुन चुका हूँ, मोनिका बलूची (आह!!!) के कुछ videos देख के खुश हो चुका हूँ और फिलहाल अद्वैत काला की 'Almost Single' हाथ मे ले कर TC का इंतज़ार कर रहा हूँ.
मेरी सामने वाली berth पर बैठी एक साँवली-सलोनी आंटी काफी देर से देख रही है कि मैं novel हाथ मे भले ही लिए हुए हूँ, लेकिन उसे पढने मे मेरा कोई ख़ास ध्यान नहीं है. मौके का फायदा उठाकर वो मुझसे इशारे मे ही novel मांगती है (मुझे ऐसे कमबख्तों से सख्त चिढ है, जो train मे बैठ कर दूसरों की किताबें या magazines मांगने लगते है) लेकिन मैं भी इशारे से ही जता देता हूँ कि अभी पढ़ रहा हूँ, इसलिए उसे वो novel नहीं मिलने वाली.
मेरे इनकार के बाद आंटी शायद बुरा मान गई है और उसका चेहरा कुछ कुछ वैसा हो गया है जैसा दुर्गा पूजा के लिए बनाई जाने वाली राक्षस की मूर्ती का होता है. जबकि मैं सोच रहा हूँ कि यदि आंटी के चेहरे पर उन राक्षसों जैसी दाढ़ी-मूंछे निकल आये तो उसके बेचारे पति की हालत क्या होगी.
तभी वहां अचानक श्री श्री 108 श्री TC महाराज (जय हो) प्रकट होते हैं. उसे देख के मैं इतना खुश हो जाता हूँ जितना कुछ साल पहले 'ऐसा जादू डाला रे'  गाने मे लारा दत्ता को नाचते देखकर हुआ था. खैर मैं उस TC (उसने इतनी गर्मी मे भी एक मोटा कोट पहन रखा है) से बात करता हूँ और उसे महात्मा गांधी की तस्वीरों वाला थोडा हरा चारा खिलाता हूँ. अब मैं अपने station तक अगले coach की एक side lower berth (वाह!) का मालिक हूँ.
Berth मिलने की ख़ुशी मे मैं Alexander the great जैसा महसूस कर रहा हूँ, जैसे कोई बड़ी लड़ाई जीत ली हो. मैं जल्दी से अपना बैग उठाता हूँ और उस आंटी (जो अब मुँह फेरे खिड़की से बाहर देख रही है) की तरफ एक नज़र डालकर अगले coach मे मौजूद अपनी berth की तरफ चल देता हूँ, इस वक्त मेरी बेफिक्री ऐसी है कि साला Tony Stark भी पानी मांग जाए.
जब तक TCs में थोड़ा सा भी लालच बाकी है, तब तक trains में पैसे देकर यूं ही berths मिलती रहेंगी. जय हो.

Wednesday, June 16, 2010

ये साले कॉलेज के दोस्त

सालों बाद Orkut पर enter कर रहा हूँ, बहुत सारे दोस्तों के scraps हैं... जाने क्यों उनके profiles खोल-खोल के देख रहा हूँ. शायद जानना चाहता हूँ कि वो कुछ बदल गए हैं या अब भी वैसे ही बकचोद हैं...
कॉलेज मे masters के वक्त दो दोस्त हुआ करते थे.... शोएब  और प्रशांत.
दोनों उम्र मे मुझसे बड़े थे, लेकिन जब मैं और प्रशांत जम के बियर पी लेते तो काहे की उम्र... शोएब कमीना पीता नहीं था (आज भी नहीं पीता) लेकिन जब हम दोनों पी के टुन्न होते तो वो हमें देख के बड़े मजे लेता था... उसका वो कमीनगी वाला चेहरा मैं कभी नहीं भूल सकता.
हम तीनो class की बंदियों के साथ घूमते, नई-नई चीज़ें try करते, खूब फिल्मे देखते, और शाम को जब बंदियाँ अपने hostel चली जाती तो मैं और प्रशांत अक्सर बियर पीकर बटर चिकन उड़ाते...
फिर जब हर चीज़ की अति हो जाती और exams करीब आ जाते तो हम सब मिल के थोडा बहुत पढ़ लेते (इसे हम group study कहते थे, जबकि study कितनी होती थी, ये सबको पता है)
Exams के दौरान शोएब के अन्दर का desperate student जाग जाता, जब हम तीनो प्रशांत की खटारा बाइक पे चढ़ के exams देने जा रहे होते तब भी शोएब के हाथ मे notes या book ज़रूर होती और वो कुछ ना कुछ याद करने मे लगा होता.
ये देखकर प्रशांत कहता, 'अरे महाराज (हाँ, हम MP-UP वालों मे से कई, इस लफ्ज़ पर बहुत भरोसा करते हैं ) अब बस कीजिये'
और शोएब अपनी बच्चों जैसी smile के साथ जवाब देता, 'नहीं महाराज फोड़ देना है साले को' (इस फोड़ देने का मतलब किसी को नहीं पता, शोएब को भी नहीं)
कॉलेज मे सबके एक पसंदीदा professor हुआ करते थे, Mr. Baghel
यार क्या पढ़ाते थे वो, एकदम Google जैसे थे, जो चाहो पूछ लो, हर subject मे माहिर.
उनकी class कोई नहीं छोड़ता था
एक और professor थीं, हमारे Mass Communication Dept. की head उप्पल मैम. उनका persona और attitude ऐसा था कि class की हर लड़की उन्ही के जैसी बनना चाहती थी. वो retirement की उम्र की थीं और उन्होंने शादी नहीं की थी. उनकी ये बात हर लड़की को बहुत fascinate करती थी. लडकियों से उप्पल मैम की बनती भी खूब थी. और हम लड़के (इस fascinated बिरादरी से बाहर वाले) मैम को बेलन वाली बाई की तरह देखते थे. हालाँकि हम उनकी बहुत इज्ज़त करते थे, और उनके सच्चेपन के कायल थे.
इसके अलावा कुछ virus किस्म के professors भी थे, जिनका पढाना सबको अखरता था और इतना ज्यादा अखरता था कि वो बेचारे यदि कोई सही बात भी बताते तो भी सबको गलत ही लगती.
Classroom के बाहर campus मे ही चाची की चाय की दुकान थी. Break के दौरान वहां सब चाय पीते और फिर तय  करते कि अगली class attend करनी है या bunk. जब किन्ही दो दोस्तों के बीच कोई बहस या झगडा होता तो गुस्सा दिखाने के लिए एक class room मे होता और दूसरा चाची की चाय की दूकान मे पेड़ के नीचे बैठा होता...
प्रशांत और शोएब एक ही flat मे रहते थे... landlord के घर मे दो बड़े-बड़े पालतू कुत्ते थे. एक alsatian और दूसरा dalmatian. साले वाकई मे बहुत कुत्ते थे. उनके गले मे ज़ंजीर पड़ी रहती और जब कोई उनके सामने से निकलता तो दोनों मिल के दहाड़ते. उनकी दहाड़ शायद शोएब को बहुत बुरी लगती, इसलिए वो जब भी उनके सामने से निकलता कोई न कोई इशारा ज़रूर करता, गाली भी देता.
फिर एक दिन उनमे से एक कुत्ते को शोएब से बदला लेने का मौका मिल गया, उसने शोएब को काट खाया, उस वक्त मैं और प्रशांत शायद कॉलेज मे थे, बाद मे जब शोएब ने हमें अपनी राम कहानी (कुत्ते का हमला और फिर doctor के injection का हमला) सुनाई तो हमने बहुत अफ़सोस जताया और जब शोएब चला गया तो मैं और प्रशांत खूब हँसे.
एक और लड़का था, दूसरे department का, राजेश रंजन नाम था उसका.
उससे कोई खास दोस्ती तो नहीं थी, लेकिन उसकी बिहारी ठसक बहुत कमाल थी. उसे याद करते ही लंगड़ा त्यागी अपने आप ही याद आ जाता है, हालाँकि वो लंगड़ा जितना शातिर नहीं था.
Masters ख़तम होने तक कुछ झगडे हुए, बोलचाल भी बंद हुआ, एक-दूसरे को मनाना भी हुआ... अब याद करके हँसी आती है... वो बचपना मजेदार था.
आज हर कोई एक दूसरे से दूर अलग-अलग शहरों मे अपना career बनाने मे लगा है. पता नहीं अब कौन किसके बारे में क्या सोचता है या कभी सोचता भी है या नहीं. शोएब से मेरी आज भी फोन पर बात होती रहती है, हम आज भी एक-दूसरे को गाली दे के बात कर लेते हैं. प्रशांत से बात हुए एक-डेढ़ साल हो गया है, पता नहीं हम एक दूसरे को फ़ोन क्यों नहीं करते. उसकी साले की तो शादी भी हो गई है और एक बेटी भी है.
कभी कभी लगता है कि कॉलेज के वक़्त जैसी दोस्ती अब किसी और से होना मुमकिन नहीं है शायद. हालाँकि दोस्त अब भी बनते हैं, लेकिन वो दोस्ती कम और professional relationship ज्यादा होती है.

Monday, May 31, 2010

मैं...

सुबह के पांच बजने वाले हैं, मैं चाहता हूँ कि सो जाऊं, लेकिन नींद के बजाय मेरे दिमाग मे वो pornstar घूम रही है, जिसे मैंने अपना computer बंद करके अभी-अभी खुद से दूर किया है. Porn stars से live chat करना किसी party से कम नहीं होता.
बिस्तर पर लेटा हुआ हूँ और हवा कुछ ज्यादा ही ठंडी लग रही है. कोई भी मौसम हो, सुबह के पांच बजे इतनी ठंडक तो होती ही है. सोच रहा हूँ कि अगले महीने तक मुझे ये घर बदलना है, इसका bathroom मुझे पसंद नहीं.
वो pornstar अब मेरे दिमाग से जा चुकी है.
उठकर night bulb जला देने की इच्छा हो रही है, घुप्प अँधेरा अच्छा नहीं लग रहा. लेकिन फिर उस bulb की धीमी, घिनौनी रोशनी याद आ जाती है.
अब अँधेरा बेहतर लग रहा है.
मोबाइल उठाकर यूं ही inbox की सैर कर लेता हूँ, कुछ पुराने massage दोबारा पढ़ लेता हूँ, कुछ को delete कर देता हूँ. Images के folder में जाकर कुछ पुराने photographs देख लेता हूँ. Color theme और wallpaper भी बदल देता हूँ. लेकिन अब क्या? नींद तो अब भी गायब है.
Vodka का असर भी अब पूरी तरह ख़तम हो चुका है.
उठकर टीवी on कर लेता हूँ, HBO पर रिडली  स्कॉट की Body of Lies आ रही है. मेरी पसंदीदा फिल्मो मे से एक, लेकिन फिर भी मैं उसे देखने के बजाय channels surf करने लगता हूँ, ज्यादातर channels पर information advertising की बकवास छाई हुई है.
दरवाज़ा खोल कर बालकनी मे आ जाता हूँ. कुछ देर बाद सुबह होने वाली है और आसमान में कुछ नारंगीपन आना शुरू हो रहा है, बेहद खूबसूरत. मेरी आँखें खुश हो रही हैं.
आसपास किसी किस्म का कोई शोर भी नहीं है, इसलिए कुछ ज्यादा ही अच्छा लग रहा है. गहरा खालीपन, सुकून और एक अजीब सी आज़ादी.
सड़क के उस तरफ की एक street light जलते-जलते अचानक बुझ गई है. शायद वो भी सोने चली गई है.
वापस लौटता हूँ, और बिस्तर पर आकर लेट जाता हूँ, टीवी पर किसी music channel पर कैटरीना कैफ नाच रही है,
ज़रा-ज़रा touch me touch me touch me...
मैं उसे touch करने के बजाय ये बताना चाहता हूँ कि उसकी jawline करीना से भी ज्यादा sharp है.
गाना ख़तम हो चुका है, कैटरीना जा चुकी है. मैं टीवी बंद कर देता हूँ, कमरे में फिर घुप्प अँधेरा है, मुझे अच्छा लग रहा है.
वो pornstar... कैटरीना... KG class की वो दोस्त मीनू... वो लड़की जिसे सालों पहले मैंने चरस पीते हुए देखा था... सारी औरतें मुझे एक साथ याद आ रही हैं...
पता नहीं मुझे नींद कब आएगी...

Monday, May 10, 2010

JUST TAKE LITE


बहुत कम औरतें इतनी दिलकश लगती हैं, जिन्हें देखकर दिमाग में हज़ारों ख़याल पैदा हो जाएँ. इस वीडियो मे (और इस फोटो मे भी) जिया खान ऐसी ही औरत लगती है. खासकर तब, जब सीढ़ियों से नीचे उतर रही होती है, और तब जब पूल मे आधी डूबकर नाचते हुए बार-बार अपने औरत होने का अहसास करा रही होती है.
इसमें कुछ तो ख़ास है या शायद इसके देखने में. क्यूंकि जब भी आँखें भर के देखती हैं, लगता है जैसे या तो मर जाएगी या मार डालेगी. एकदम जानलेवा.

Saturday, May 8, 2010

लव सेक्स और धोखा+सिंगल स्क्रीन सिनेमाहॉल

...खस्ताहाल, गंदले और बदबूदार सिनेमाहाल मे एक ऐसी फिल्म, जिसका इंतज़ार तब से था, जब पहली बार नेट पर उसका खूबसूरत पोस्टर देखा था। हाल के पार्किंग लाट पर अपनी बाइक खड़ी करता हूँ, ढेर साड़ी गाड़ियाँ खड़ी हुई हैं, सोचता हूँ - वाह, फिल्म चल जाएगी शायद क्योंकि लास्ट शो मे इतने लोग कम ही दिखते हैं (भले ही पहला दिन हो) वो भी तब जब फिल्म मे कोई फन्ने खां स्टार ना हो...
...इस चुप्पे शहर मे कोई पीवीआर, आईमैक्स या फन सिनेमा नहीं है, बस ज्योति, सरगम, रंगमहल जैसे ईस्ट मैन कलर पीरियड वाले नामो के सफ़ेद परदे हैं, उन्ही मे से एक संगम भी है। 
...तो ६० रुपये का सबसे महँगा- हा...हा...हा...- 'बालकनी गोल्ड' टिकट लेता हूँ और अन्दर जाता हूँ वहां पतली मूछों और मोटे चेहरे वाला एक बंदा (जिसके हाथ मे एक स्टील की टार्च है) मेरे पीले रंग का टिकट लेकर इत्मीनान से आधा फाड़ता है, मेरी हड़बड़ी देखता है और टोंट  मारने वाले लहजे मे एक ग्रेट इन्फार्मेशन देता है, "अबी सुरु नीं हुई हे, पन्दरा मिनट हें " मैं बाकी का बचा खुचा टिकट वापस लेता हूँ, अन्दर घुसता हूँ...
...सिंगल स्क्रीन सिनेमाहाल का टिकट भी साला, सबसे परफेक्ट रिप्रेजेंटेटिव होता है वहां का दुनिया का सबसे पतला कागज़, पीला, गुलाबी या फिर नीले रंग का
...हाल के अन्दर- सीढ़ियों के नीचे, खम्भों के ऊपर और चारो कोनो मे- फिल्म का कामसूत्र नुमा पोस्टर लगा हुआ है उफ़... कितना खूबसूरत है जब भी देखता हूँ इसे, लगता है पहली बार देख रहा हूँ, ब्रिलियंट। अब क्रेडिट टाइटल पढ़ रहा हूँ झटका! प्रोड्यूसर्स मे एकता कपूर का नाम नहीं है ऐसा कैसे? यानि मेरी इन्फार्मेशन गलत थी तो फिर पैशन फार सिनेमा मे एकता और दिबाकर बैनर्जी का जो कंवर्जेशन पढ़ा था, वो साला क्या था??? सोचा, चलो कल चेक करूँगा...
...सब कुछ जान लेने की हवस के चलते दुनिया भर की चीज़ें पढ़ लेना और फिर खुद को बुद्ध का अवतार मान कर कोई रेफरेंस चेक करना, लेकिन अगर वो गलती से भी गलत निकले तो ऐसा झटका लगना जैसे अमेरिका ने मेरे अपने सर पे न्यूक्लियर बम गिराने की धमकी पर्सनली दी हो- मेरे साथ ऐसा ही होता है.
...तो वापस मुड़ता हूँ, सीढियां चढ़ता हूँ, और हॉल के अन्दर पहुंचकर टॉर्च वाले को- जो गेट पर खड़े टॉर्च वाले का जुड़वाँ लगता है- अपना टिकट दिखाता हूँ. वो बंद सबसे ऊपर वाली लाइन की सीट पर टॉर्च लाइट डाल कर कहता है- बो जो पीली सर्ट बाले भैया हें ना, उनके जस्ट आगे बाली. - जाकर अपनी सीट पर बैठता हूँ. सीट के  हत्थों  के अगले सिरे पर बने गड्ढों मे कोल्ड ड्रिंक की खाली  बोतलें घुसी हुई हैं.- घटिया सिनेमा हॉल मे आपका स्वागत है. - थोड़ी खीझ महसूस करता हूँ और फिर उन बोतलों को बगल की खाली  सीटों के गड्ढों मे पटकता हूँ. अब खाली सफ़ेद परदे की तरफ घूरना शुरू कर देता हूँ...
...सिनेमा हॉल कितना भी बुरा हो, फिल्म  मन की हो तो सब माफ़. और अगर फिल्म का नाम लव, सेक्स और धोखा जैसा कुछ हो तब तो सौ खून भी माफ़. 
... तो फिल्म शुरू होने मे अभी थोडा टाइम है, मोबाइल निकालकर मैसेज टाइप करता हूँ- लव, सेक्स और धोखा डार्लिंग लव, सेक्स और धोखा- और दो-तीन दोस्तों को भेज देता हूँ. उनके रिप्लाई आना भी शुरू हो जाते हैं- फिल्म देख रहे हो क्या?? डार्लिंग डार्लिंग डार्लिंग.  वाह-वाह .- पीछे की सीटों पर चार-पांच इंजीनियरिंग स्टुडेंट्स बैठे हैं.- ये स्टुडेंट्स की वो कौम है जो एक नज़र मे ही पहचान मे आ जाती है.- इन्ही मे वो पीली शर्ट वाले भैया भी हैं. हंसी-ठट्ठा चल रहा है. एक बोलता है, यार डॉली को भी ले के आना चाहिए...ठहाका! दूसरा बोलता है, हाँ बे बड़ा झाटू हॉल है साला एक भी माल नहीं है...एक और ठहाका! तीसरा एक्साईटमेंट मे उतराते हुए बोलता है, अबे आज तो गाली-वाली देते हुए देखेंगे पिक्चर...फिर ठहाका.  
...जब आस-पास कोई लड़की ना हो, और सिर्फ ढेर सारे लड़के हों - वो भी सिनेमाहाल मे - तो माहौल कुछ ज्यादा ही मर्दाना हो जाता है. हर कोई एक्सट्रीम हरकतें करने लगता है. फिर चाहे ठहाके लगाना हो, गालियाँ देना हो, या तरह-तरह के इशारे करना. 
...तो किसी फिल्मी विधवा जैसे दिख रहे खाली सफ़ेद परदे पर अचानक रंग दिखने लगते हैं, लगता है जैसे फिल्म शुरू हो गई. लेकिन विजुअल ऐसा है जैसे विको वज्रदंती टाइप के किसी प्रोडक्ट का ऐड हो. लेकिन फिर अगले ही पल लगता है कि अरे नहीं यार फिल्म ही है, कुछ ज्यादा ही इनोवेटिव है. अलग-अलग किस्म और क्वालिटी वाले कैमरों का कोई लोकल-सस्ता सा ऐड जैसा कुछ दिखाया जा रहा है. इसके बाद डिस्क्लेमर या वार्निंग जैसा कुछ आता है. जिसमे शुद्ध राष्ट्र भाषा मे कुछ ऐसा लिखा है- कैमरा हिल सकता है, फोकस और लाइटिंग की भी दिक्कत हो सकती है, इसलिए जिसे भी बवासीर, भगंदर या...- पूरा पढ़ पाऊ इसके पहले ही वो टेक्स्ट स्क्रीन से गायब हो जाता है. मैं मन मसोस के रह जाता हूँ. वाकई कुछ बेहद नया देखने को मिलने वाला है. तय कर लेता हू की जैसे ही इसकी ओरिजनल डीवीडी आएगी, तुरंत खरीद लूँगा. अब फिल्म शुरू हो रही है और मेरी आँखें, कान, नाक, मुंह सब फिल्म से चिपक गए हैं. आस-पास की किसी और चीज़ पर ध्यान दे पाना नामुमकिन है, लव, सेक्स और धोखा डार्लिंग लव, सेक्स और धोखा. डार्लिंग, डार्लिंग, डार्लिंग...
...लग रहा है जैसे सालो बाद कुछ नया देखने को मिला है, इन्ग्लोरिअस बास्टर्ड्स, पल्प फिक्शन और पैरानार्मल एक्टिविटी भी इतनी इंट्रेस्टिंग नहीं लगी थीं. शायद देसी चीज़ का स्वाद कुछ अलग ही होता है, मुझे रानी मुखर्जी याद आ रही है.
...तो अब  इंटरवल हो चूका है, इसके पहले मैं कई बार ताली बजा चुका हूँ. पीछे बैठे इंजीनियरिंग स्टुडेंट्स ने भी इसमें खूब साथ निभाया. ज्यादातर लोग उठकर निवृत्त होने या कुछ खाने-पीने जा रहे हैं. मेरे ब्लेडर मे भी पानी भर गया है, लेकिन मैं उठकर कही नहीं जाता, इस डर से कि कही मेरे लौटने से पहले फिल्म शुरू हो गई तो?? मैं एक फ्रेम भी मिस करना नहीं चाहता. कुछ मिनट बीत चुके हैं, फिल्म अब तक शुरू नहीं हुई है. मन मे आता है कि जाकर हल्का हो आऊँ, फिर लगा कि अब तो और कम टाइम बचा है. सीट और मैं एक दुसरे से चिपके हुए है. अब छिछोरे टाइप के दो अंकल लोग अपना पॉपकॉर्न और सॉफ्ट ड्रिंक हाथ मे लिए मेरे सामने वाली सीट पर आकर बैठ जाते हैं. एक बोलता है- मेने तो का ता सापित देकने चलते हें, जाने माकडा क्या दिका रिया हे- दूसरा अंकल कोई जवाब नहीं देता. फिल्म शुरू हो चुकी है...
... जब भी कोई फिल्म देख रहा होता हूँ, और किसी दूसरे  बन्दे का रिऐक्शन मेरे मन मुताबिक नहीं होता तो लगता है, बेवकूफ साला, कुछ नहीं आता जाता इसे...
 ...तो अब फिल्म ख़तम हो चुकी है. क्रेडिट टाईटल के साथ लव, सेक्स और धोखा डार्लिंग लव, सेक्स और धोखा बजने लगता है. सम-अप सॉन्ग का विजुअल देखकर पता चलता है कि फिल्म की एक फीमेल कैरेक्टर की ज़िन्दगी का इकलौता मकसद पूरा हो गया है, यानि नैरेटिव अब तक मौजूद है, वाह भई!!! मैं अपनी सीट से उठना नहीं चाहता, लेकिन मेरे आगे की सीट वाले लोग उठकर खड़े हो गए है. और उनके कारण  मुझे गाना दिखाई नहीं दे रहा है. मजबूरी मे मैं भी उठ के खड़ा हो जाता हूँ. अपने दोनों हाथ जींस की जेबों मे समेटे हुए मैं कुछ डिवाइन सा महसूस कर रहा हूँ. सोच रहा हूँ कि यदि अगला शो दिखाया जाने वाला होता तो दोबारा टिकट खरीदकर बैठ जाता, लेकिन अफ़सोस कि ये आज का लास्ट शो है. हॉल से बहार निकलकर, सीढियां उतरते हुए अपने आस-पास के लोगो के रिऐक्शन्स  सुनना चाहता हूँ. लेकिन मुझे सिर्फ शोर सुनाई दे रहा है, कोई बात ठीक से समझ नहीं आ रही. या फिर शायद मुझे सुनाई देना बंद हो गया है. पता नहीं. पार्किंग लाट पर पहुचकर बाइक स्टार्ट करता हूँ, आस-पास की हर आवाज़ गूंजती हुई सी लग रही है. पार्किंग लाट एकदम बंद-बंद सा है. बाइक लेकर मैं सड़क पर आ जाता हूँ. 
अब ऐसा लग रहा है जैसे किसी खुले मैदान मे आ गया हूँ. घर की तरफ चल देता हूँ, रात का सवा ग्यारह बज रहा है, सड़क करीब-करीब खाली है, कोई ट्रैफिक  नहीं. मेरे अन्दर का रोबोट ड्राइविंग कर रहा है और मैं बाइक चलाते हुए अब भी फिल्म देख रहा हूँ, लव, सेक्स और धोखा डार्लिंग लव, सेक्स और धोखा. डार्लिंग, डार्लिंग, डार्लिंग...